रक्तपथ: जंगल का क़ानून

 

रक्तपथ: जंगल का क़ानून

1990 का दशक। बिहार की रक्तरंजित भूमि पर, जहाँ जाति, राजनीति और अपराध का अपवित्र गठबंधन ही परम सत्य है, आमड़ी नामक एक छोटा सा गाँव शांति से साँस लेता है। किंतु एक रात, यह शांति एक भयावह चीख़ में बदल जाती है। शक्तिशाली बाहुबली और विधायक बनने का आकांक्षी, गजेंद्र "गज्जू" सिंह, एक गहरे राजनीतिक षड्यंत्र को छिपाने के लिए पूरे गाँव को जीवित जला देता है। उस नरसंहार की राख से केवल एक शरीर जीवित बचता है—दस वर्षीय अर्जुन प्रसाद, जिसकी आँखों ने उस रात अपने पिता की हत्या और अपने संसार का विनाश देखा था।

एक दशक पश्चात, अर्जुन लौटता है। वह अब एक मासूम बालक नहीं, बल्कि गिद्धपुरी की गलियों में पला-बढ़ा एक कठोर, कुशल और प्रतिशोध से भरा युवक है। उसका जीवन का एकमात्र उद्देश्य है गजेंद्र सिंह का सर्वनाश। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, वह अपराध की दुनिया की सीढ़ियाँ चढ़ता है, गज्जू के प्रतिद्वंद्वी गिरोह में शामिल होता है, और स्वयं एक भयावह 'भूत' के रूप में अपनी पहचान बनाता है जो सालीमपुर के सत्ता के समीकरणों को हिला देता है।

किंतु जैसे-जैसे वह अपने लक्ष्य के निकट पहुँचता है, उसे एक और भी गहरे और अंधकारपूर्ण सत्य का आभास होता है। उसे पता चलता है कि गज्जू सिंह तो इस विशाल षड्यंत्र का केवल एक चेहरा है, और असली तार तो पटना में बैठे एक शक्तिशाली मंत्री, भार्गव दत्त, के हाथों में हैं।

इसी दौरान, उसकी राह एक आदर्शवादी, किंतु विवश आरक्षी अधीक्षक इमरान आलम और एक साहसी पत्रकार अमृता सिन्हा से टकराती है, जो दोनों अपने-अपने तरीक़े से इसी अपवित्र गठजोड़ को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं। विश्वासघात और धोखे के मध्य, इन तीन टूटे हुए लोगों का एक हताश गठबंधन बनता है। अब अर्जुन को न केवल एक बाहुबली और एक मंत्री से, बल्कि उस पूरी भ्रष्ट प्रणाली से लड़ना है जिसने उसे बनाया है। "रक्तपथ" केवल एक प्रतिशोध की कहानी नहीं है; यह उस भयावह प्रश्न का उत्तर खोजती है कि जब न्याय स्वयं एक अपराधी बन जाए, तो एक व्यक्ति को किस सीमा तक जाना पड़ता है।

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अध्याय : आमड़ी का मातम

सालीमपुर ज़िले की विशाल, सपाट भूमि पर पसरे सैकड़ों गाँवों में से एक था आमड़ी। यह कोई ऐसा गाँव नहीं था जिसका नाम ज़िले के मुख्यालय में बैठे अधिकारियों की ज़ुबान पर चढ़ता हो, न ही यहाँ की धूल भरी सड़कों पर कभी किसी बड़े नेता की गाड़ी के पहिए घूमते थे। आमड़ी बस थाएक जीता-जागता, साँस लेता हुआ अस्तित्व, जो अपनी धीमी, लयबद्ध गति से चलता था, जैसे युगों से चलता आया हो।

जेठ की दोपहरी में जब सूरज आग उगलता था, तो गाँव की गलियाँ सूनी हो जाती थीं। फूस और खपरैल की छतों वाले मिट्टी के घर चुपचाप धूप सहते। औरतें दरवाज़ों की ओट में या आँगन में लगे नीम के पेड़ों की घनी छाँह में बैठकर बातें करतीं, और बच्चे इमली के पेड़ों के नीचे कंचे खेलते। शाम ढलते ही गाँव जाग उठता था। खेतों से लौटते पुरुषों की आवाज़ें, बैलों के गले में बंधी घंटियों की टनटनाहट, और घरों के चूल्हों से उठता धुँआयह सब मिलकर आमड़ी की पहचान बनाते थे।

यह गाँव मुख्यतः दलितों की बस्ती थी, उन लोगों का घर जो पीढ़ियों से ज़मींदारों के खेतों में पसीना बहाते आए थे, पर जिनकी अपनी ज़मीन बस उतनी ही थी, जितनी उनके घर के नीचे या दरवाज़े के आगे थी। फिर भी, गाँव में एक संतोष था, एक तरह का ठहराव। यहाँ की हवा में भले ही समृद्धि न हो, पर डर भी नहीं था। कम से कम, अब तक तो नहीं था।

इसी गाँव के सिरे पर एक छोटा, साफ़-सुथरा घर था, जिसकी दीवारों पर अभी भी पिछले वर्ष की सफ़ेदी की हल्की चमक बाकी थी। यह घर गाँव के बाकी घरों से थोड़ा अलग था, इसलिए नहीं कि यह ज़्यादा बड़ा था, बल्कि इसलिए कि इसके छोटे से बरामदे में एक पुरानी लकड़ी की मेज़ और कुर्सी रखी रहती थी। यह देवेंद्र प्रसाद का घर था, और वह मेज़-कुर्सी उनकी दुनिया थी। देवेंद्र प्रसाद गाँव के एकमात्र शिक्षक थे, जिन्होंने पास के कस्बे के विद्यालय से दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई की थी। वह गाँव के बच्चों को पेड़ के नीचे बिठाकर अक्षर-ज्ञान कराते थे, और इसके बदले में गाँव वाले उन्हें थोड़ा-बहुत अनाज या सब्ज़ी दे जाते थे।

पर देवेंद्र प्रसाद सिर्फ़ एक शिक्षक नहीं थे। वह एक पत्रकार भी थे, हालाँकि उनका पत्रकारिता का क्षेत्र गाँव की सीमाओं से ज़िले के साप्ताहिक समाचार-पत्र तक ही सीमित था। हर सप्ताह वह अपनी पुरानी साइकिल पर बैठकर कस्बे तक जाते और अपने हाथ से लिखे लेख समाचार-पत्र के संपादक को दे आते। वह गाँव की समस्याओं, सूखे की आशंका, या सरकारी योजनाओं की धीमी गति पर लिखते थे। उनके लिखे में सच्चाई की एक तीखी धार होती थी, जो कभी-कभी सत्ता के गलियारों में बैठे छोटे-मोटे अधिकारियों को चुभ जाती थी।

दस वर्षीय अर्जुन के लिए उसके पिता ही उसका संसार थे। वह अपने पिता की हर गतिविधि को बड़ी उत्सुकता से देखता था। जब देवेंद्र प्रसाद अपनी ऐनक चढ़ाकर, स्याही वाली कलम से काग़ज़ पर अक्षर उकेरते, तो अर्जुन चुपचाप उनके पास बैठकर उन अक्षरों को बनते देखता, जो जल्द ही छपकर सैकड़ों लोगों तक पहुँचने वाले थे। उसे अपने पिता पर गर्व था। वह जानते थे कि उसके पिता एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, एक ऐसे व्यक्ति जिनका सम्मान गाँव के बड़े-बुज़ुर्ग भी करते थे।

उस दिन भी दोपहर ऐसी ही शांत थी। अर्जुन अपने पिता के पास बरामदे में बैठा था। देवेंद्र प्रसाद एक महत्वपूर्ण काग़ज़ पर झुके हुए थे, जो किसी सरकारी दस्तावेज़ की प्रतिलिपि लग रही थी। उन्होंने अर्जुन से कहा था, "यह ज़मीन के काग़ज़ हैं, अर्जुन। यह हमारी ज़मीन के सबूत हैं। सिर्फ़ हमारी नहीं, पूरे गाँव की।"

अर्जुन ने उत्सुकता से पूछा, "कौन सी ज़मीन, बाबूजी?"

"वही, जिस पर हमारे पुरखे रहते आए हैं। जिस पर यह गाँव बसा है," देवेंद्र ने गहरी साँस लेते हुए कहा। "कुछ लोग कहते हैं कि यह ज़मीन उनकी है, पर क़ानून हमारे साथ है।" उनकी आवाज़ में एक दृढ़ता थी, एक आत्मविश्वास जो उन्होंने किताबों और क़ानून की अपनी सीमित समझ से हासिल किया था।

तभी गाँव के बाहर से एक अपरिचित शोर उठा। यह शोर धीरे-धीरे बढ़ रहा था, एक भारी गड़गड़ाहट, जैसे कोई विशालकाय जानवर धरती रौंदता हुआ चला आ रहा हो। गाँव के कुत्ते आशंकित होकर भौंकने लगे। औरतें दरवाज़ों से झाँकने लगीं, और बच्चे अपने खेल छोड़कर घरों की ओर भागे।

शोर नज़दीक आता गया। जल्द ही, धूल का एक বিশাল गुबार गाँव की कच्ची सड़क पर उठता दिखाई दिया। उस गुबार के भीतर से तीन बड़ी लारियों और दो जीपों की काली आकृतियाँ उभरीं। गाड़ियों का ऐसा क़ाफ़िला आमड़ी के लोगों ने पहले कभी नहीं देखा था।

गाड़ियाँ गाँव के बीचोबीच, बड़े बरगद के पेड़ के पास आकर रुकीं। उनके रुकते ही धूल का बादल नीचे बैठा और उसमें से पचास-साठ लोग उतरे। उनके हाथों में लाठियाँ और गंडासे थे, और कुछ के कंधों पर पुरानी, एकनाली बंदूकें लटक रही थीं। वे सभी अजनबी थे, उनके चेहरे कठोर और आँखें क्रूर थीं।

एक जीप से एक लंबा-चौड़ा, भयावह दिखने वाला व्यक्ति उतरा। उसने सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहना था, पर उसकी आँखों में सफ़ेदी का कोई अंश नहीं था। उसकी मोटी गर्दन में सोने की एक मोटी ज़ंजीर चमक रही थी और उसके चेहरे पर एक स्थायी क्रूरता का भाव था। यह ओमकार सिंह था, गजेंद्र "गज्जू" सिंह का दाहिना हाथ और उसकी शेर सेना का सेनापति। गज्जू सिंह का नाम ही सालीमपुर ज़िले में दहशत का दूसरा नाम था।

ओमकार सिंह ने अपनी शिकारी आँखों से पूरे गाँव का जायज़ा लिया। लोग डरकर अपने घरों में दुबक गए थे। सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्ग और देवेंद्र प्रसाद अपनी जगह पर खड़े रहे।

"कौन है देवेंद्र मास्टर?" ओमकार की भारी, कर्कश आवाज़ गूँजी।

देवेंद्र प्रसाद शांति से आगे बढ़े। उनकी चाल में कोई हड़बड़ाहट नहीं थी। "मैं हूँ देवेंद्र प्रसाद। कहिए, कैसे आना हुआ?"

ओमकार सिंह हँसा, एक ऐसी हँसी जिसमें तिरस्कार भरा था। "मास्टर, सुना है तुम आजकल ज़मीन-जायदाद के बड़े ज्ञाता बन गए हो? गाँव वालों को क़ानून सिखा रहे हो?"

"मैं सिर्फ़ सच बता रहा हूँ," देवेंद्र ने शांत स्वर में उत्तर दिया। "यह ज़मीन गाँव वालों की है। हमारे पास इसके काग़ज़ हैं।"

"काग़ज़?" ओमकार फिर हँसा। उसने अपनी जीप से एक काग़ज़ निकाला और उसे हवा में लहराया। "यह देख, मास्टर! यह है नया काग़ज़। इस पर मालिक का नाम लिखा हैगजेंद्र सिंह। और मालिक का फ़रमान है कि यह ज़मीन कल सुबह तक ख़ाली हो जानी चाहिए। यहाँ पत्थर की खदान खुलेगी।"

गाँव में एक भयावह सन्नाटा छा गया। पत्थर की खदान का मतलब था गाँव का उजड़ना।

देवेंद्र की आवाज़ अब भी स्थिर थी। "यह संभव नहीं है। हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे। हम अदालत जाएँगे।"

अदालत का नाम सुनते ही ओमकार का चेहरा तमतमा गया। वह आगे बढ़ा और देवेंद्र के हाथ से वह सरकारी दस्तावेज़ छीनकर फाड़ दिया। "यह है हमारी अदालत, मास्टर!" उसने ज़मीन पर पड़े काग़ज़ के टुकड़ों की ओर इशारा करते हुए कहा। "और यह है हमारा फ़ैसला! कल सुबह तक ज़मीन ख़ाली कर देना, वरना इस गाँव का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा।"

उसने अपनी बंदूक़धारी लोगों को इशारा किया। वे गाँव वालों को धमकाते हुए, उनकी झोपड़ियों के दरवाज़ों पर लाठियाँ पटकते हुए घूमने लगे। हवा में एक palpable भय घुल गया था। अर्जुन, जो दूर से यह सब देख रहा था, डर के मारे काँप रहा था। उसने अपने पिता का ऐसा अपमान पहले कभी नहीं देखा था।

ओमकार सिंह और उसके गुंडे कुछ देर और आतंक मचाते रहे, और फिर जैसे आए थे, वैसे ही धूल उड़ाते हुए चले गए। उनके जाने के बाद भी गाँव पर एक भारी, मनहूस चुप्पी छाई रही। शाम ढल गई, पर आज किसी घर में चूल्हा नहीं जला। हर चेहरे पर एक ही सवाल थाअब क्या होगा?

देवेंद्र प्रसाद ने लोगों को इकट्ठा किया। उन्होंने कहा, "डरो मत। वे हमें सिर्फ़ धमका रहे हैं। क़ानून हमारे साथ है। मैं कल ही सुबह ज़िला मुख्यालय जाकर एस.डी.. साहब से मिलूँगा।"

लोगों को उनके शब्दों से कुछ ढाढ़स बँधा, पर उनकी आँखों में बसा डर कम नहीं हुआ। वह रात आमड़ी की सबसे लंबी और सबसे काली रात साबित होने वाली थी।

रात का दूसरा पहर था। गाँव गहरी नींद में डूबा था, एक ऐसी नींद जो डर से बोझिल थी। अर्जुन अपने पिता के पास लेटा था, पर उसे नींद नहीं आ रही थी। उसे बार-बार ओमकार सिंह का क्रूर चेहरा और अपने पिता के फटे हुए काग़ज़ याद आ रहे थे।

तभी, रात की खामोशी को चीरती हुई एक चीख़ उठी।

और फिर एक के बाद एक कई चीख़ें। उनके साथ ही गोलियों की आवाज़ें और मर्दों की वहशी दहाड़ें गूँजने लगीं। पूरा गाँव एक पल में जाग गया, पर जागने के लिए नहीं, बल्कि मौत का सामना करने के लिए।

देवेंद्र प्रसाद बिस्तर से उछल पड़े। उन्होंने तुरंत अर्जुन का हाथ पकड़ा। "बाहर मत निकलना!"

बाहर से आ रही आवाज़ें दिल दहला देने वाली थीं। दरवाज़े तोड़े जा रहे थे, औरतें और बच्चे चीख़ रहे थे। हवा में जलते हुए फूस और बारूद की गंध घुलने लगी थी। शेर सेना लौट आई थी, अपना फ़रमान सुनाने नहीं, बल्कि उसे लागू करने।

देवेंद्र ने अपने घर के कोने में बने अनाज के भंडारण के लिए बने छोटे, अँधेरे तहख़ाने का ढक्कन खोला। यह मिट्टी का बना एक छोटा सा गड्ढा था, जिसे ऊपर से लकड़ी के एक भारी तख़्ते से ढका जाता था। "अर्जुन, इसके अंदर छिप जाओ! जब तक मैं न कहूँ, बाहर मत आना, चाहे कुछ भी हो जाए! आवाज़ बिलकुल मत करना!" उनके स्वर में एक ऐसी तत्परता थी जो अर्जुन ने पहले कभी नहीं देखी थी।

उन्होंने अर्जुन को लगभग धकेलकर उस अँधेरे गड्ढे में डाल दिया और ऊपर से लकड़ी का तख़्ता रख दिया। तख़्ते की दरारों से बाहर की हल्की रोशनी और भयावह आवाज़ें अंदर आ रही थीं। अर्जुन डर के मारे सिकुड़ गया।

बाहर का कोलाहल बढ़ गया था। अब उसे अपने ही घर का दरवाज़ा टूटने की आवाज़ आई। कई भारी क़दम अंदर आए।

"कहाँ है वो मास्टर?" यह ओमकार सिंह की आवाज़ थी।

"अंदर ही होगा, मालिक। भागकर कहाँ जाएगा?" किसी और ने कहा।

अर्जुन ने दरार से झाँका। आग की लपटों की रोशनी में उसे ओमकार और उसके चार आदमी दिखाई दिए। उन्होंने उसके पिता को पकड़ रखा था। देवेंद्र के चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक असीम घृणा और धिक्कार का भाव था।

"बहुत क़ानून सिखाता था न, तू?" ओमकार ने देवेंद्र के मुँह पर एक ज़ोरदार घूँसा मारा। देवेंद्र ज़मीन पर गिर पड़े।

"मेरा बेटा कहाँ है?" देवेंद्र ने कराहते हुए पूछा।

"तेरा बेटा? अब तक तो आग में भुन गया होगा, बाकी गाँव वालों की तरह," ओमकार हँसा। "पर तू इतनी आसानी से नहीं मरेगा, मास्टर। तुझे हम ऐसी मौत देंगे कि आने वाली सात पुश्तें क़ानून का नाम लेने से पहले काँपेंगी।"

ओमकार ने अपने आदमी को इशारा किया। उसने एक गंडासा उठाया, जो आग की रोशनी में चमक रहा था।

अर्जुन अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। वह चीख़ना चाहता था, पर उसके पिता के शब्द उसके कानों में गूँज रहे थे—"आवाज़ बिलकुल मत करना।" उसका शरीर काँप रहा था, पर वह पत्थर की मूर्ति बना दरार से चिपका रहा।

उसने देखा। उसने अपने पिता को, अपने संसार को, अपनी आँखों के सामने खत्म होते हुए देखा।

बाहर का शोर धीरे-धीरे कम होता गया। चीख़ें बंद हो गईं, गोलियों की आवाज़ें थम गईं। सिर्फ़ आग की लपटों की चटकने की आवाज रह गई थी। ओमकार और उसके आदमी जा चुके थे।

अर्जुन उस अँधेरे, दमघोंटू गड्ढे में कितनी देर पड़ा रहा, उसे पता नहीं। शायद घंटों। उसका शरीर सुन्न हो चुका था, और उसका दिमाग़ ख़ाली।

जब सुबह की पहली किरण लकड़ी के तख़्ते की दरारों से छनकर अंदर आई, तब जाकर उसने हिम्मत जुटाई। उसने काँपते हाथों से भारी तख़्ते को थोड़ा सा सरकाया और बाहर झाँका।

जो दृश्य उसने देखा, वह किसी दस वर्षीय बच्चे की कल्पना से परे था। उसका घर जलकर राख हो चुका था। जहाँ कल शाम तक एक जीवंत गाँव था, वहाँ अब सिर्फ़ सुलगते हुए खंडहर, बिखरा हुआ सामान और लाशें थीं। हर तरफ़ मौत की खामोशी पसरी थी, जिसे रह-रहकर किसी जलती हुई लकड़ी की चटकने की आवाज़ तोड़ रही थी। हवा में जले हुए मांस और धुएँ की एक असहनीय गंध थी।

उसने अपने पिता का शव देखा, जो घर के ठीक बीच में पड़ा था।

वह धीरे-धीरे अपने तहख़ाने से बाहर निकला। उसके पैर राख और अंगारों पर पड़ रहे थे। वह अपने पिता के पास गया और उनके ठंडे हाथ को छुआ। उसकी आँखों से आँसू नहीं निकले। शायद सारे आँसू रात के अँधेरे में ही सूख चुके थे।

वह उस जलते हुए गाँव के बीच में अकेला खड़ा था। सूरज उग रहा था, पर आमड़ी के लिए वह एक ऐसी सुबह थी जिसकी कोई शाम नहीं होनी थी। अर्जुन की आँखों में अब किसी बच्चे का भोलापन नहीं था। उस दस साल के बच्चे की आँखों में एक ऐसी ठंडक, एक ऐसी नफ़रत और एक ऐसा संकल्प जम गया था, जो किसी जलते हुए गाँव की आग से भी ज़्यादा दहक रहा था।

उसका बचपन आमड़ी की राख में दफ़न हो चुका था। और उस राख से एक ऐसे भविष्य का जन्म हुआ था जिसका रास्ता सिर्फ़ और सिर्फ़ इंतक़ाम की आग से होकर गुज़रना था।

अध्याय : शहर की धूल

दस वर्ष। एक पूरी दहाई। इतने समय में बीज विशाल वृक्ष बन जाते हैं, सूखी नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती हैं और बस्तियाँ शहर का रूप ले लेती हैं। दस वर्षों में एक बच्चा जवान हो जाता है। पर अर्जुन के लिए यह सिर्फ़ समय का गुज़रना नहीं था। यह एक निरंतर चलने वाला यज्ञ था, जिसमें उसका बचपन, उसकी मासूमियत, उसकी हँसी, सब कुछ आहुति बन कर जल गया था। आमड़ी की राख से जो लड़का उठा था, वह अब बीस वर्ष का एक युवक था, पर उसकी आँखों में उम्र से कहीं ज़्यादा पुरानी एक ठंडक थी।

वह अब रामपुर शहर की सबसे घनी और बदनाम बस्ती में रहता था, जिसे लोग गिद्धपुरी कहते थे। यह नाम सार्थक था। यहाँ जीवन एक निरंतर संघर्ष था, जहाँ कमज़ोर को नोच खाने के लिए हर मोड़ पर कोई न कोई गिद्ध घात लगाए बैठा रहता था। यहाँ की गलियाँ इतनी तंग थीं कि दिन में भी सूरज की रोशनी नीचे पहुँचने से कतराती थी। दोनों ओर बेतरतीब खड़े मकान एक-दूसरे पर झुके हुए थे, जैसे किसी भी पल ढह जाएँगे। खुली नालियों की तेज़ बदबू, सस्ते मसाले में जलते भोजन की गंध, और सैकड़ों लोगों की मिली-जुली आवाज़ों का शोरयही गिद्धपुरी की पहचान थी।

इसी भीड़ और कोलाहल के बीच अर्जुन एक परछाईं की तरह रहता था। वह न किसी से अधिक बोलता, न किसी के मामले में दखल देता। बस्ती के लोग उसे जानते थे, पर कोई यह दावा नहीं कर सकता था कि वह उसे समझता है। वे बस इतना जानते थे कि वह समीर पहलवान के लिए काम करता है और उससे न उलझना ही बेहतर है।

अर्जुन का शरीर गठा हुआ और फुर्तीला था, किसी खूँखार जंगली जानवर की तरह। उसमें पहलवानों जैसा भारीपन नहीं था, बल्कि एक ऐसी दुबली-पतली शक्ति थी जो अचानक हमला करने के लिए बनी हो। पर उसकी असली पहचान उसके शरीर से नहीं, उसकी आँखों से होती थी। शांत, स्थिर और गहरी आँखें, जो हर चीज़ को देखती थीं, तौलती थीं, पर अपने भीतर का कोई भाव प्रकट नहीं होने देती थीं। उन आँखों ने दस साल पहले जो प्रलय देखी थी, वह अब भी उनके अँधेरे कोनों में कहीं जीवित थी।

आज हफ़्ता वसूली का दिन था। यह अर्जुन का काम था। समीर पहलवान ने गिद्धपुरी के छोटे-छोटे दुकानदारों और फेरीवालों पर एक अनकहा कर लगा रखा था, जीने की क़ीमत। और उस क़ीमत को वसूलने का काम अर्जुन का था।

वह अपनी छोटी, अँधेरी कोठरी से निकला। उसने एक पुराना, भूरे रंग का कुर्ता और पायजामा पहना हुआ था। उसके बाल छोटे कटे हुए थे और चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वह तंग गलियों से गुज़रने लगा। लोग उसे देखकर रास्ता छोड़ देते। बच्चे जो खेल रहे होते, उसे आते देख अपनी माँओं के पल्लू में छिप जाते। अर्जुन इन सब पर ध्यान नहीं देता था। उसकी चाल में एक निश्चितता थी, एक उद्देश्य था।

उसका पहला पड़ाव रामभरोसे का चाय का ठेला था। रामभरोसे एक बूढ़ा, कमज़ोर आदमी था, जिसकी कमर ज़िंदगी के बोझ से झुक गई थी। उसने अर्जुन को दूर से ही देख लिया था। उसके हाथ काँपने लगे। उसने जल्दी से गल्ले में से कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकाले और अर्जुन के पहुँचने से पहले ही हाथ में पकड़ लिए।

अर्जुन ठेले के सामने आकर चुपचाप खड़ा हो गया। उसने कुछ कहा नहीं, बस अपनी शांत आँखों से रामभरोसे को देखा। यही उसका तरीक़ा था। उसे चीख़ने-चिल्लाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उसकी खामोशी ही सबसे बड़ी धमकी थी।

"यह... यह इस हफ़्ते का, अर्जुन बेटा," रामभरोसे ने काँपते हुए हाथ आगे बढ़ाए।

अर्जुन ने पैसे ले लिए। उसने उन्हें गिना नहीं, बस मोड़कर अपनी जेब में रख लिया। फिर उसकी नज़र चाय के खौलते हुए पतीले पर पड़ी। रामभरोसे ने तुरंत एक गिलास में चाय छानकर उसकी ओर बढ़ाई। अर्जुन ने चाय ले ली और वहीं खड़े-खड़े पीने लगा। इस दौरान बस्ती में जो भी होता रहा, उसकी पीठ उस ओर थी, पर उसका ध्यान हर आहट पर था। वह जानता था कि इस जंगल में शिकारी हर समय शिकार की तलाश में रहते हैं।

चाय ख़त्म करके उसने ख़ाली गिलास ठेले पर रखा और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया।

उसने इसी तरह चार और जगहों से वसूली की। हर जगह वही दृश्य थाडर, काँपते हाथ और बिना सवाल किए पैसों का भुगतान। यह काम उसे पसंद नहीं था, पर उसे जीवित रहने के लिए इसकी ज़रूरत थी। गिद्धपुरी में जीवित रहने का मतलब था ताक़तवर होना, और ताक़त दिखाने के लिए किसी ताक़तवर के साथ होना ज़रूरी था। समीर पहलवान वह ज़रिया था।

जब वह वसूली करके लौट रहा था, तो उसने देखा कि रामभरोसे के ठेले पर भीड़ लगी है। यह कोई सामान्य भीड़ नहीं थी। वहाँ तनाव था। चार-पाँच हट्टे-कट्टे लड़के रामभरोसे को घेरे हुए थे, और उनका सरगना, भोला, रामभरोसे का कॉलर पकड़े हुए था। भोला पास की बस्ती का एक उभरता हुआ गुंडा था और समीर पहलवान के इलाक़े में अपनी पैठ बनाना चाहता था।

"क्यों रे बुड्ढे! हफ़्ता हमें दिए बिना समीर को कैसे दे दिया? यह इलाक़ा अब हमारा है!" भोला दहाड़ रहा था।

रामभरोसे गिड़गिड़ा रहा था, "मैंने तो दे दिया, भोला। अर्जुन अभी लेकर गया है।"

अर्जुन का नाम सुनते ही भोला और भड़क गया। "कौन अर्जुन? वह चूहा? आज हम उसे भी देखेंगे और उसके पहलवान को भी!" उसने रामभरोसे को एक धक्का दिया। बूढ़ा आदमी ज़मीन पर गिर पड़ा, और चाय का पतीला लुढ़क गया।

अर्जुन कुछ दूर रुककर यह सब देख रहा था। उसके चेहरे पर अब भी कोई भाव नहीं था। यह उसका मामला नहीं था। वह अपना काम कर चुका था। समीर जाने और भोला जाने। वह मुड़ा और अपनी कोठरी की ओर बढ़ने लगा।

"अरे, देखो! वह रहा समीर का पालतू कुत्ता!" भोला के एक साथी ने अर्जुन की ओर इशारा करते हुए चिल्लाया।

अर्जुन रुक गया। उसने धीरे से सिर घुमाया। उसकी आँखों में पहली बार एक हल्की सी, सर्द चमक दिखाई दी।

भोला और उसके साथी हँसते हुए उसकी ओर बढ़े। "क्या रे? अपने मालिक के लिए दुम दबाकर भाग रहा है? आज तेरी वसूली हम करेंगे।" भोला ने अपना हाथ अर्जुन के कंधे पर रखने की कोशिश की।

और तभी, सब कुछ बदल गया।

अर्जुन का शरीर बिजली की गति से घूमा। उसका हाथ उठा और भोला की कलाई को एक अस्वाभाविक कोण पर मोड़ दिया। एक दर्द भरी चीख़ निकली। इससे पहले कि भोला के साथी कुछ समझ पाते, अर्जुन का दूसरा हाथ हरकत में आया। उसकी कमर में खोंसा हुआ एक पुराना, धारदार छुरा अब उसके हाथ में था।

यह कोई फ़िल्मी लड़ाई नहीं थी। इसमें कोई लंबी-चौड़ी कलाबाज़ी नहीं थी। यह क्रूर, प्रभावी और संक्षिप्त थी।

एक गुंडा लाठी लेकर दौड़ा। अर्जुन झुका, लाठी का वार हवा में गया, और अर्जुन का छुरा उस आदमी के पेट में गहरा उतर गया। उसने छुरा बाहर खींचा और तुरंत दूसरे की ओर बढ़ा। दूसरा आदमी डरकर पीछे हटा, पर उसका पैर किसी पत्थर से टकराया और वह लड़खड़ा गया। अर्जुन ने एक पल भी नहीं गँवाया। उसने ज़मीन पर पड़े आदमी की गर्दन पर पैर रखा और छुरी की नोक उसकी आँख के ठीक सामने टिका दी।

"ज़िंदा रहना है?" अर्जुन की आवाज़ शांत थी, पर उस शांति में मौत की ठंडक थी। वह आदमी डर के मारे काँपता हुआ सिर हिलाने लगा।

अब तक भोला अपनी टूटी कलाई पकड़े कराह रहा था और उसका एक साथी पेट पकड़कर ज़मीन पर तड़प रहा था। बाकी दो डर के मारे पत्थर बन गए थे।

अर्जुन उठा। उसने अपनी छुरी पर लगा खून अपने पायजामे से पोंछा और उसे वापस कमर में खोंस लिया। उसने एक नज़र उन चारों पर डाली, जो कुछ पल पहले दहाड़ रहे थे और अब ज़मीन पर पड़े कीड़े लग रहे थे। फिर वह मुड़ा और ऐसे चलने लगा जैसे कुछ हुआ ही न हो।

गली में मौत जैसा सन्नाटा छा गया था। लोग अपने दरवाज़ों और खिड़कियों से भय और विस्मय से देख रहे थे। उन्होंने अर्जुन को पहले भी देखा था, पर उसका यह रूप आज पहली बार देखा था। यह किसी गुंडे का रूप नहीं था, यह किसी जल्लाद का रूप था।

जब तक समीर पहलवान अपने कुछ साथियों के साथ वहाँ पहुँचा, तब तक अर्जुन जा चुका था। समीर ने ज़मीन पर पड़े भोला और उसके आदमियों को देखा और फिर भीड़ की आँखों में अर्जुन के लिए पसरे ख़ौफ़ को। वह ज़ोर से हँसा और अपनी छाती ठोककर बोला, "देखा! यह है समीर पहलवान का इलाक़ा! यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता!"

पर जब वह यह बोल रहा था, तो उसकी अपनी आवाज़ में एक हल्की सी काँप थी। वह जानता था कि यह ताक़त उसकी नहीं थी। यह उस शांत, ख़तरनाक लड़के की ताक़त थी, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता था, सिवाय इसके कि वह मौत बाँटना जानता है।

अर्जुन अपनी कोठरी में पहुँच गया था। यह एक छोटा, सीलन भरा कमरा था, जिसमें एक टूटी हुई चारपाई और दीवार में एक छोटा सा आला था, जिसमें उसकी कुछ ज़रूरत की चीज़ें रखी थीं। यहाँ कोई खिड़की नहीं थी, सिर्फ़ एक छोटा रोशनदान था जिससे छनकर थोड़ी रोशनी आती थी। यह कमरा किसी सन्यासी की कुटिया जैसा था, या किसी क़ैदी की कोठरी जैसा।

उसने अपने कुर्ते पर लगे खून के छींटे देखे और उसे उतारकर फेंक दिया। उसने पानी से अपने हाथ और मुँह धोए। फिर वह चारपाई पर बैठ गया और अपनी कमर से छुरा निकाला।

यह उसका एकमात्र साथी था, एकमात्र संपत्ति। उसने एक छोटा, चिकना पत्थर निकाला और छुरी की धार तेज़ करने लगा। पत्थर के छुरी के फल पर घिसने की एक लयबद्ध, खुरदरी आवाज़ कमरे की खामोशी में गूँजने लगी। उसकी पूरी एकाग्रता उसी काम पर थी। उसकी हर गति सधी हुई थी, जैसे वह कोई पूजा कर रहा हो। यह छुरा उसके लिए सिर्फ़ एक हथियार नहीं था। यह उसके अस्तित्व का विस्तार था। यह वह चीज़ थी जिसने उसे इन दस सालों में जीवित रखा था।

जब धार आईने की तरह चमकने लगी, तब वह रुका। उसने छुरी को साफ़ किया और उसे तकिये के नीचे रख दिया।

बाहर रात घिर आई थी। गिद्धपुरी का शोर धीरे-धीरे कम हो रहा था। अर्जुन चारपाई पर लेट गया और आँखें बंद कर लीं।

पर नींद उसके लिए कभी आसान नहीं थी। जैसे ही चेतना की पकड़ ढीली पड़ती, अतीत के राक्षस उस पर हमला कर देते।

वह फिर से दस साल का बच्चा बन गया। वह अपने घर के उस अँधेरे, दमघोंटू तहख़ाने में क़ैद था। बाहर से उसके अपने लोगों की चीख़ें आ रही थीं। उसे जलते हुए फूस और इंसानी मांस की गंध आ रही थी। वह लकड़ी के तख़्ते की दरार से झाँक रहा था।

आग की बड़ी-बड़ी लपटें नाच रही थीं। और उन लपटों की रोशनी में वह चेहरा थाओमकार सिंह का क्रूर, हँसता हुआ चेहरा। और उसके सामने ज़मीन पर पड़े उसके पिता थे... देवेंद्र प्रसाद।

वह अपने पिता के आख़िरी शब्द सुनने की कोशिश करता है, पर उसे सिर्फ़ ओमकार की वहशियाना हँसी सुनाई देती है। वह गंडासे को हवा में उठता हुआ देखता है... उसकी धार आग की रोशनी में चमकती है...

एक चीख़ उसके गले में फँस जाती है।

अर्जुन झटके से उठ बैठा। उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था और उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। वह अपनी अँधेरी कोठरी में था, पर उसकी आँखों के सामने अब भी आमड़ी की जलती हुई रात का मंज़र था।

उसने अपने काँपते हुए हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया। बीस साल का वह युवक, जिसने कुछ घंटे पहले बिना पलक झपकाए इंसानी खून बहाया था, उस अँधेरी कोठरी में एक दस साल के अनाथ बच्चे की तरह काँप रहा था।

यह उसका रोज़ का नियम था। दिन में वह एक शिकारी होता था, एक पत्थर-दिल जल्लाद। पर हर रात, यादें उसे फिर से शिकार बना देती थीं। हर रात उसे याद दिलाती थी कि वह कौन है और उसे क्या करना है।

उसने तकिये के नीचे से अपना छुरा निकाला। उसने ठंडे धातु को अपनी हथेली में महसूस किया। इस अहसास ने उसकी काँपती हुई साँसों को स्थिर किया।

नहीं, वह भूलेगा नहीं। वह कभी नहीं भूलेगा। शहर की यह धूल, यह गंदगी, यह रोज़ की हिंसायह सब सिर्फ़ एक पड़ाव है, एक तैयारी। उसकी असली मंज़िल कहीं और है। उसकी मंज़िल का नाम सालीमपुर है।

और उस मंज़िल पर उसका इंतज़ार कर रहा है, गजेंद्र सिंह।

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