चम्बल-गाथा: विद्रोह की ज्वाला: चम्बल का सत्य, जो आज भी दबा हुआ है

 

चम्बल-गाथा

१९६० का दशक। चम्बल के बीहड़। जहाँ बंदूकें बोलती हैं और जहाँ जीवन सस्ता है। इसी कठोर भूमि पर पले-बढ़े शिक्षित युवक अर्जुन सिंह के स्वप्न उस समय टूटकर बिखर जाते हैं जब स्थानीय जमींदार धीरेंद्र प्रताप सिंह उसकी पैतृक भूमि पर कब्ज़ा कर लेता है और विरोध करने पर उसके पिता की नृशंस हत्या कर दी जाती है। न्याय के सभी द्वार बंद पाकर, अर्जुन प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ बीहड़ों की शरण लेता है।

वहाँ वह अपने जैसे ही सताए हुए राम सिंह और लखन के साथ मिलकर एक छोटा सा विद्रोही दल बनाता है। अपने असाधारण साहस, न्यायप्रियता और ‘बाग़ी धर्म’ के सिद्धांतों के कारण वह शीघ्र ही ‘अर्जुन बाग़ी’ के नाम से पूरे चम्बल में प्रसिद्ध हो जाता है – शोषितों के लिए आशा की किरण, और अत्याचारियों के लिए मृत्यु का पर्याय। उसका संघर्ष उसे चतुर और निर्मम आरक्षी अधीक्षक विक्रम राठौड़ के सीधे टकराव में ले आता है, जो अर्जुन को समाप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। साथ ही, उसे बीहड़ के पुराने, क्रूर डाकू सरदार भैरव सिंह गुर्जर की शत्रुता का भी सामना करना पड़ता है, जो अर्जुन के सिद्धांतों को अपनी सत्ता के लिए ख़तरा मानता है।

इन बाहरी संघर्षों के बीच, अर्जुन का हृदय देवगढ़ की साहसी और शिक्षित गौरी के प्रति स्नेह से भी भर उठता है, जो उसके कठोर जीवन में प्रेम और आशा का संचार करती है। किन्तु क्या एक बाग़ी के जीवन में प्रेम के लिए कोई स्थान है? क्या वह अपने दल की एकता को बनाए रख पाएगा, विशेषकर जब मंगल जैसा महत्वाकांक्षी सदस्य भीतरघात करने को तैयार हो?

"चम्बल-गाथा: विद्रोह की ज्वाला" केवल एक एक्शन और रोमांच से भरपूर उपन्यास नहीं, बल्कि यह मानवीय भावनाओं, नैतिक द्वंद्वों, सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष और एक व्यक्ति के असाधारण संकल्प की एक गहन और मार्मिक गाथा है। यह कहानी आपको चम्बल के उस युग में ले जाएगी जहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण एक चुनौती था, और जहाँ न्याय की पुकार अक्सर बंदूक की आवाज़ में दब जाती थी।


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Sample Chapters : 


अध्याय : माटी का मोल

चम्बल नदी के तटवर्ती अंचल में, जहाँ ऊँचे-नीचे बीहड़ प्रकृति की कठोरता और मानव के अदम्य संघर्ष की कहानियाँ एक साथ कहते प्रतीत होते थे, रामपुर नामक एक छोटा सा ग्राम अपनी शांत, लगभग अलसाई हुई दिनचर्या में लीन था। प्रभात की पहली किरणें अभी धरती का पूर्ण स्पर्श भी कर पाई थीं, जब अर्जुन सिंह अपने पिता हरनाम सिंह के साथ अपने छोटे से, किन्तु प्राणप्रिय, भूखंड पर पहुँच चुका था। अर्जुन, लगभग तेईस-चौबीस वसंतों का ऊर्जावान युवक, जिसके चौड़े मस्तक पर शिक्षा की आभा और गहरी, विचारमग्न आँखों में अपने ग्राम और समाज के उत्थान के स्वप्न तैरते थे, अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पसीना बहा रहा था। उसके सुगठित शरीर पर परिश्रम के चिह्न स्पष्ट थे, फिर भी उसके मुख पर एक अजीब सी शांति और सौम्यता विराजमान थी।

हरनाम सिंह, पचास-पचपन की आयु के अनुभवी कृषक, जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव देख चुके थे। उनकी कमर समय के साथ कुछ झुक चली थी, और बालों में चांदी की लकीरें खिंच आई थीं, किन्तु उनकी आँखों में अब भी वही तेज और हाथों में वही दृढ़ता थी जो उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली थी। माटी से उनका सम्बन्ध केवल आजीविका का नहीं, अपितु आत्मा का था। प्रत्येक बीज जो वे बोते थे, उसमें उनकी आशाएँ और आकांक्षाएँ भी सिंचित होती थीं।

पानी आज कुछ और चाहिए होगा, बेटा,” हरनाम सिंह ने खेतों की सूखी मेड़ों को देखते हुए कहा, उनकी आवाज़ में अनुभव की गहराई थी।घाम तेज़ होने से पहले जितना काम निपट जाए, उतना ही भला।

अर्जुन ने सहमति में सिर हिलाया।हाँ, बापू। मैं दोपहर तक कुएँ से और पानी खींच लाऊँगा। आप अधिक श्रम करें, वैद्यजी ने आपको आराम करने को कहा था।पिछली फसल के समय अधिक परिश्रम के कारण हरनाम सिंह की पुरानी कमर की पीड़ा उभर आई थी।

दोनों पिता-पुत्र मौन रहकर अपने-अपने कार्य में जुट गए। दूर क्षितिज पर सूर्य धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था, और उसकी सुनहरी किरणें चम्बल के जल पर नृत्य करती हुई एक मनोहारी दृश्य उत्पन्न कर रही थीं। खेतों में काम करते हुए भी अर्जुन का मन गाँव की अन्य समस्याओं में उलझा हुआ था। उसने शहर के महाविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी, और उसकी इच्छा थी कि वह अपने ज्ञान का उपयोग गाँव की दशा सुधारने में करे। वह अक्सर गाँव के अन्य युवकों को शिक्षा के महत्व और संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देता था।

उनके छोटे से घर में, जो गाँव के एक छोर पर स्थित था, अर्जुन की माँ शारदा और छोटी बहन माया भी दैनिक कार्यों में व्यस्त हो चुकी थीं। शारदा, लगभग पैंतालीस-पचास वर्ष की एक शांत और ममतामयी स्त्री, अपने परिवार की धुरी थीं। उनके चेहरे पर चिंता की कुछ स्थायी रेखाएँ थीं, जो संभवतः जीवन के संघर्षों और अपने पति तथा पुत्र के विद्रोही स्वभाव की देन थीं, किन्तु उनकी आँखों में असीम वात्सल्य और होंठों पर सदैव एक हल्की सी मुस्कान रहती थी। माया, सोलह-सत्रह वर्ष की चंचल और सलोनी किशोरी, अपने भाई अर्जुन को आदर्श मानती थी। वह भी कुछ पढ़ना-लिखना सीख रही थी और अपने भाई के सपनों में अपना भविष्य देखती थी। परिवार में आर्थिक कठिनाइयाँ थीं, पर आपसी स्नेह और सामंजस्य उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी।

जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, रामपुर गाँव की गतिविधियाँ भी बढ़ने लगीं। चौपाल पर गाँव के कुछ वृद्ध हुक्का गुड़गुड़ाते हुए देश-दुनिया की चर्चाओं में व्यस्त थे, तो कुछ स्त्रियाँ पनघट से जल भरकर ला रही थीं। बच्चे धूल में खेलते हुए शोर मचा रहे थे। वातावरण में एक सहज ग्रामीण शांति व्याप्त थी, किन्तु इस शांति के नीचे एक अनकहा भय और अनिश्चितता भी दबी हुई थीजमींदार धीरेंद्र प्रताप सिंह का भय।

लगभग मध्याह्न के समय, जब अर्जुन और हरनाम सिंह अपने खेत से लौटने की तैयारी कर रहे थे, गाँव में एक अप्रत्याशित हलचल हुई। घोड़ों की टापों और लठैतों की हुँकार से शांत वातावरण भंग हो गया। जमींदार धीरेंद्र प्रताप सिंह अपने लगभग दस-बारह शस्त्रधारी लठैतों के साथ गाँव की मुख्य चौपाल पर धमका था। धीरेंद्र प्रताप, लगभग पैंतालीस वर्ष का ऊँचा-पूरा, रौबीला किन्तु क्रूर मुखाकृति वाला व्यक्ति था। उसकी आँखों में सत्ता का मद और हृदय में गरीबों के प्रति घृणा स्पष्ट झलकती थी। उसने क्षेत्र के कई गाँवों में अपनी धाक जमा रखी थी और उसकी इच्छा के विरुद्ध पत्ता भी नहीं हिलता था।

चौपाल पर उपस्थित ग्रामीण भय और आशंका से सिहर उठे। धीरेंद्र प्रताप सिंह घोड़े से उतरा, उसकी नज़रों में अहंकार और उपेक्षा का भाव था। उसने अपने एक मुंशी को इशारा किया, जिसने एक पुराना, जीर्ण-शीर्ण कागज़ों का पुलिंदा निकाला।

रामपुर के वासियो!” धीरेंद्र प्रताप की भारी, कर्कश आवाज़ गूँजी।तुम्हें यह सूचित किया जाता है कि गाँव की यह सामुदायिक भूमि, जिस पर तुम सब अनादिकाल से अपना अधिकार समझते आए हो, और इसके अतिरिक्त, गाँव के पश्चिम में स्थित लगभग पचास बीघा कृषि भूमिजिसमें हरनाम सिंह, घसीटा राम, मंगू लोहार और कुछ अन्य किसानों की ज़मीनें भी शामिल हैंअब मेरे स्वामित्व में है।उसने अपने हाथ में पकड़े कोड़े को हवा में फटकारा।ये हैं इसके प्रमाणिक राजकीय दस्तावेज़! मेरे पूर्वजों ने यह भूमि वर्षों पहले तत्कालीन शासकों से प्राप्त की थी।

मुंशी ने वे पीले पड़ चुके कागज़ हवा में लहराए, जिन पर अस्पष्ट सी मोहरें और लिखावट थी। ग्रामीणों के बीच कानाफूसी और भय का एक ठंडा सा करंट दौड़ गया। हरनाम सिंह और अर्जुन भी चौपाल पर पहुँच चुके थे।

हरनाम सिंह का खून खौल उठा।यह सरासर अन्याय है, जमींदार साहब! यह भूमि पीढ़ियों से हमारी है। हमारे बाप-दादाओं ने इसे अपने पसीने से सींचा है। आपके ये कागज़ झूठे हैं!”

कुछ अन्य किसान भी दबी आवाज़ में हरनाम सिंह का समर्थन करने लगे।हाँ, यह हमारी ज़मीन है! हम इसे नहीं छोड़ेंगे!”

धीरेंद्र प्रताप सिंह ठहाका मारकर हँसा।झूठे? हरनाम, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरे दस्तावेज़ों को झूठा कहो? ये देखो,” उसने कोड़े से कागज़ों की ओर संकेत किया, “इस पर राज्य की मोहर है। तुम अनपढ़ गंवार क्या जानो कानून और दस्तावेज़ों की कीमत!”

तभी अर्जुन आगे बढ़ा। उसके स्वर में दृढ़ता थी, किन्तु वाणी में अब भी संयम था।जमींदार साहब, यदि ये दस्तावेज़ इतने ही प्रमाणिक हैं, तो इन्हें न्यायालय में प्रस्तुत क्यों नहीं किया गया? और यदि यह भूमि आपके पूर्वजों की थी, तो इतने वर्षों तक आपने इस पर अपना अधिकार क्यों नहीं जताया? हमें ये दस्तावेज़ देखने और इनकी सत्यता की जाँच करवाने का पूरा अधिकार है।

अर्जुन के शिक्षित और तर्कपूर्ण शब्दों से धीरेंद्र प्रताप क्षण भर के लिए चौंका, फिर उसका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। एक साधारण किसान का बेटा, जो शहर जाकर कुछ अक्षर ज्ञान सीख आया था, उसकी सत्ता को चुनौती दे रहा थायह उसके लिए असहनीय था।

छोकरे!” वह गुर्राया।तू मुझे कानून सिखाएगा? तेरी ज़बान कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गई है। लगता है शहर की हवा लग गई है तुझे।उसने अपने लठैतों को इशारा किया, जो तुरंत अर्जुन और हरनाम सिंह की ओर बढ़ने लगे।मैं तुम्हें तीन दिन की मोहलत देता हूँ। या तो शांति से मेरी भूमि खाली कर दो, या फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो। और याद रखना, मेरी पहुँच बहुत ऊपर तक है। कोई आरक्षी, कोई न्यायालय तुम्हारी सहायता नहीं करेगा।

लठैतों ने किसानों को धमकाते हुए पीछे धकेल दिया। भयभीत ग्रामीण अपने-अपने घरों की ओर भागने लगे। हरनाम सिंह और अर्जुन भी अपमान और क्रोध से भरे हुए अपने घर लौटे। धीरेंद्र प्रताप सिंह विजयी भाव से अपने घोड़े पर सवार हुआ और अपने लठैतों के साथ रामपुर से चला गया, पीछे छोड़ गया आतंक और अनिश्चितता का एक गहरा साया।

रात घिर आई थी। अर्जुन के छोटे से घर में चूल्हा तो जला था, पर किसी के मुँह में अन्न का दाना नहीं जा रहा था। शारदा अपनी आँखों में उमड़ते आँसुओं को रोकने का असफल प्रयास कर रही थीं, तो माया सहमी हुई अपने भाई और पिता का मुँह देख रही थी। हरनाम सिंह चुपचाप चारपाई पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, किन्तु उनके चेहरे की हर रेखा तनाव और चिंता की कहानी कह रही थी।

हमें कुछ करना होगा, बेटा,” अंततः हरनाम सिंह ने कहा, उनकी आवाज़ में थकान थी।यह ज़मीन हमारी माँ है। हम इसे ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। मैं अपनी अंतिम साँस तक इसके लिए लडूंगा।

अर्जुन ने अपने पिता के पैरों के पास बैठकर उनके घुटनों पर हाथ रखा।बापू, आपका निश्चय सराहनीय है, पर हमें भावनाओं के साथ-साथ बुद्धि से भी काम लेना होगा। धीरेंद्र प्रताप सिंह शक्तिशाली है और उसके सम्पर्क भी ऊँचे हैं। हमें कानूनी मार्ग अपनाना चाहिए। मैं कल ही शहर जाकर किसी अच्छे अधिवक्ता से मिलूँगा। हमारे पास भी तो अपने खेतों के कुछ कागज़ात हैं।

शारदा ने हस्तक्षेप किया।बेटा, अधिवक्ताओं की फीस बहुत होती है। हमारे पास इतने साधन कहाँ? और क्या वे जमींदार के विरुद्ध हमारा पक्ष लेंगे भी?” उनकी आवाज़ में निराशा थी।

हरनाम सिंह ने एक गहरी साँस ली।तुम्हारी माँ ठीक कहती है, अर्जुन। यह लड़ाई आसान नहीं। पर स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं। यह ज़मीन केवल एक टुकड़ा नहीं, हमारी पहचान है, हमारा अस्तित्व है। इसे बचाने के लिए यदि हमें सब कुछ दाँव पर लगाना पड़ा, तो हम लगाएंगे।

अर्जुन अपने पिता के दृढ़ निश्चय और माँ की व्यावहारिक चिंता के बीच अपने विचारों में खो गया। उसे धीरेंद्र प्रताप सिंह की धमकी, उसके लठैतों की क्रूरता और गाँव वालों का भय स्पष्ट दिखाई दे रहा था। किन्तु उसके हृदय में अन्याय के विरुद्ध लड़ने की एक चिंगारी भी सुलग रही थी। वह जानता था कि यह संघर्ष केवल पचास बीघा ज़मीन का नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और न्याय के सिद्धांतों का है। उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह इस लड़ाई को अपने ज्ञान और साहस से लड़ेगा, चाहे परिणाम कुछ भी हो। रामपुर की वह रात बहुत लंबी और बेचैन करने वाली थी, जैसे किसी आने वाले तूफान से पहले की खामोशी। चम्बल की लहरें भी शायद उस रात कुछ अधिक ही अशांत थीं, जैसे वे भी किसी अनहोनी की प्रतीक्षा कर रही हों।

अध्याय : अन्याय की पराकाष्ठा

रामपुर गाँव पर जमींदार धीरेंद्र प्रताप सिंह की धमकी का काला साया मंडरा रहा था। अर्जुन ने अपने पिता, हरनाम सिंह, के दृढ़ संकल्प और अपनी माँ, शारदा, की आँखों में तैरती विवशता को देखा था। कानूनी मार्ग अपनाने का उसका निश्चय और भी पुष्ट हो गया था। अगली ही सुबह, फटे पुराने कपड़ों में कुछ पैसे और खेतों के जो भी कागज़ात उनके पास थे, उन्हें एक पोटली में बाँधकर अर्जुन शहर की ओर निकल पड़ा। बैलगाड़ी उपलब्ध होने के कारण कई कोस की पदयात्रा और फिर एक खचाखच भरी, धूल उड़ाती पुरानी परिवहन निगम की बस का कष्टप्रद सफर तय करके वह दोपहर तक जिला मुख्यालय पहुँचा।

शहर का कोलाहल, अनगिनत वाहन और व्यस्त लोगरामपुर के शांत वातावरण से यह बिल्कुल भिन्न था। अर्जुन ने कुछ लोगों से पूछकर न्यायालय परिसर का मार्ग जाना। वहाँ अधिवक्ताओं की भीड़ थी, हर कोई अपने मुवक्किलों से घिरा हुआ, अपने तर्कों की धार तेज़ कर रहा था। अर्जुन कुछ देर तक इस अपरिचित दुनिया को देखता रहा, फिर साहस बटोरकर एक अनुभवी से दिखने वाले अधिवक्ता, श्री बैजनाथ शर्मा, के कक्ष में पहुँचा। कक्ष छोटा था, पुरानी फाइलों और कानूनी किताबों से अटा पड़ा था। दीवार पर महात्मा गाँधी और डॉ. अम्बेडकर की तस्वीरें थीं, जिन पर गर्द की एक मोटी परत जमी थी।

श्री बैजनाथ शर्मा अपनी आरामकुर्सी पर अधलेटे से, पान चबाते हुए किसी पुराने फैसले का अध्ययन कर रहे थे। उनके मोटे चश्मे के पीछे से झाँकती अनुभवी आँखें अर्जुन के मैले-कुचैले वस्त्रों और उसके परेशान चेहरे का आकलन कर रही थीं।

हाँ भई, क्या समस्या है?” उन्होंने बिना नज़रें उठाए पूछा, उनकी आवाज़ में एक प्रकार की ऊब और औपचारिकता थी।

अर्जुन ने सकुचाते हुए अपनी पोटली खोली और खेतों के कागज़ात उनके सामने रखे। उसने धीरेंद्र प्रताप सिंह के दावे, उसके द्वारा दिखाए गए संदिग्ध दस्तावेज़ों और गाँव वालों पर हो रहे अत्याचारों का पूरा विवरण दिया। वह आशा कर रहा था कि अधिवक्ता महोदय उसकी बातों को गंभीरता से सुनेंगे और उसे कोई राह सुझाएंगे।

श्री बैजनाथ ने पान की पीक पास रखे पीकदान में थूकी, फिर अत्यंत धीमेपन से अर्जुन द्वारा प्रस्तुत कागज़ातों को पलटना शुरू किया। बीच-बीच में वे अपनी मोटी भवों को सिकोड़ते और कुछ अस्पष्ट सीहूँ-हाँकरते रहे। अर्जुन धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता रहा, उसके हृदय में आशा और आशंका का द्वंद्व चल रहा था।

लगभग आधे घंटे की छानबीन के बाद, श्री बैजनाथ ने एक गहरी साँस ली और चश्मा उतारकर मेज पर रखा।हम्म्, मामला तो गंभीर है, युवक। धीरेंद्र प्रताप सिंह इस क्षेत्र का बड़ा और पहुँच वाला जमींदार है। उसके विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ना टेढ़ी खीर है।

अर्जुन ने उत्सुकता से पूछा, “किन्तु अधिवक्ता जी, सत्य तो हमारे पक्ष में है। ये भूमि पीढ़ियों से हमारी है। क्या कानून सत्य का साथ नहीं देगा?”

अधिवक्ता महोदय फीकी सी हँसी हँसे।सत्य? कानून? युवक, तुम अभी दुनियादारी नहीं समझे। न्यायालय में सत्य और कानून की अपनी परिभाषाएँ होती हैं, जो अक्सर शक्ति और धन के तराजू पर तौली जाती हैं। धीरेंद्र प्रताप के पास दोनों हैं। उसके अधिवक्ता भी शहर के नामी-गिरामी लोग होंगे। गवाहों को खरीदना या डराना-धमकाना उसके लिए बाएँ हाथ का खेल है।

अर्जुन का हृदय निराशा से बैठने लगा।तो क्या कोई मार्ग नहीं है? क्या हम अपनी भूमि और अपना सम्मान ऐसे ही गँवा देंगे?”

मार्ग तो है,” श्री बैजनाथ ने अपनी कुर्सी पर तनकर बैठते हुए कहा, “परन्तु वह मार्ग अत्यंत व्ययसाध्य और समय लेने वाला है। पहले तो तुम्हें धीरेंद्र प्रताप के दस्तावेज़ों को चुनौती देनी होगी, जिसके लिए ठोस प्रमाण जुटाने पड़ेंगे। फिर दीवानी न्यायालय में मुकदमा दायर करना होगा। यह मुकदमा वर्षों तक चल सकता है। प्रत्येक सुनवाई का व्यय, अधिवक्ताओं का पारिश्रमिक, और फिर भी परिणाम की कोई निश्चितता नहीं।उन्होंने अर्जुन की आर्थिक स्थिति का मौन आकलन करते हुए कहा, “तुम्हारी स्थिति देखकर लगता नहीं कि तुम यह भार उठा पाओगे।

अर्जुन ने साहस बटोरकर पूछा, “पारिश्रमिक कितना होगा, अधिवक्ता जी?”

श्री बैजनाथ ने कुछ क्षण सोचा, फिर एक ऐसी राशि बताई जिसे सुनकर अर्जुन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह राशि उसके पूरे परिवार की कई वर्षों की आय से भी अधिक थी।

इतना... इतना तो हम कभी नहीं जुटा पाएँगे,” अर्जुन की आवाज़ में हताशा थी।

यही तो समस्या है, युवक,” अधिवक्ता ने सहानुभूति जताने का प्रयास करते हुए कहा।न्याय सस्ता नहीं है, विशेषकर जब सामना धीरेंद्र प्रताप सिंह जैसे व्यक्ति से हो। मेरी सलाह मानो तो इस मामले को यहीं छोड़ दो। जमींदार से कोई छोटा-मोटा समझौता करने का प्रयास करो। थोड़ी-बहुत भूमि मिल जाए, या कुछ मुआवजा, उसी में संतोष कर लो। व्यर्थ में अपनी शक्ति और संसाधन नष्ट करने से कोई लाभ नहीं।

अर्जुन स्तब्ध रह गया। जिस कानून और न्याय व्यवस्था पर उसे इतना विश्वास था, वह आज इतनी निर्मम और पहुँच से बाहर प्रतीत हो रही थी। उसका शिक्षित मन इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पा रहा था। उसने अधिवक्ता महोदय को धन्यवाद दिया, अपने कागज़ात समेटे और भारी मन से उनके कक्ष से बाहर निकल आया। शहर का कोलाहल अब उसे और भी कर्णकटु लग रहा था। उसके स्वप्न जैसे टूटकर बिखर गए थे।

दृश्य

उसी शाम, जब सूर्य पश्चिम में अपनी अंतिम लालिमा बिखेर रहा था, अर्जुन थका-हारा, निराश मन से रामपुर लौटा। घर पहुँचते ही शारदा और माया ने उसे घेर लिया, उनकी आँखों में प्रश्न और आशा दोनों थे। हरनाम सिंह भी अपनी चारपाई से उठकर बैठ गए थे, उनकी नज़रें अर्जुन के चेहरे पर टिकी थीं।

अर्जुन ने अधिवक्ता से हुई पूरी बातचीत का विवरण दिया। जैसे-जैसे वह बताता गया, परिवार के सदस्यों के चेहरे पर निराशा के बादल गहराते गए। शारदा की आँखें फिर से भर आईं, और माया ने भयभीत होकर अपनी माँ का आँचल पकड़ लिया। हरनाम सिंह चुपचाप सब सुनते रहे, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, किन्तु उनकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं।

जब अर्जुन ने अपनी बात समाप्त की, तो कमरे में एक भारी, बोझिल चुप्पी छा गई।

तो... तो अब क्या होगा, बेटा?” शारदा ने कांपती आवाज़ में पूछा।

अर्जुन के पास कोई उत्तर नहीं था। वह स्वयं दिशाहीन महसूस कर रहा था।

तभी हरनाम सिंह की आवाज़ गूँजी, उनकी आवाज़ में अब थकान नहीं, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी।मैंने कहा था , यह लड़ाई आसान नहीं। यदि कानून हमारा साथ नहीं देगा, तो हम स्वयं अपनी लड़ाई लड़ेंगे। यह भूमि हमारी है, और इसे हम धीरेंद्र प्रताप के हाथों में नहीं जाने देंगे, चाहे इसके लिए हमें अपने प्राणों की आहुति ही क्यों देनी पड़े।उनका चेहरा पीड़ा और संकल्प से दमक रहा था।तुम चिंता मत करो, अर्जुन। हम हार नहीं मानेंगे।

हरनाम सिंह के इन शब्दों ने अर्जुन के भीतर भी एक नई ऊर्जा का संचार किया। निराशा के बादल पूरी तरह छंटे नहीं थे, पर पिता के दृढ़ संकल्प ने उसे एक नया सहारा दिया था। उसने निश्चय किया कि वह कानूनी मार्ग भले ही कठिन हो, किन्तु हार मानने से पहले वह हर संभव प्रयास करेगा।

दृश्य

अगले कुछ दिन रामपुर गाँव पर भारी गुज़रे। धीरेंद्र प्रताप सिंह की दी हुई मोहलत समाप्त होने को थी। उसके लठैत प्रतिदिन गाँव में गश्त लगाते, उनकी आँखों में क्रूरता और हाथों में चमकते हुए मोटे तेल से सने लाठे ग्रामीणों के हृदय में भय का संचार करते थे। वे जानबूझकर किसानों के खेतों के पास से गुज़रते, उनकी फसलों को घूरते और अस्पष्ट धमकियाँ देते।

सुना है, कुछ लोग ज़्यादा ही फड़फड़ा रहे हैं,” एक लठैत ने घसीटा राम के खेत के पास रुककर कहा, उसकी आवाज़ में व्यंग्य था।जमींदार साहब का हुक्म है, या तो ज़मीन छोड़ो, या फिर... खैर, समझदार को इशारा काफी है।

घसीटा राम, एक सीधा-सादा किसान, भय से कांप उठा और चुपचाप अपने काम में लग गया। मंगू लोहार, जो अपनी बहादुरी के लिए जाना जाता था, ने भी लठैतों से उलझना उचित नहीं समझा। गाँव के कई छोटे किसान, जो धीरेंद्र प्रताप की शक्ति और क्रूरता से परिचित थे, चुपचाप अपनी किस्मत को कोसते हुए अपनी भूमि छोड़ने का मन बनाने लगे थे। अर्जुन और हरनाम सिंह को अकेला पड़ता देख उनकी हिम्मत और टूट रही थी। धीरेंद्र प्रताप का आतंक धीरे-धीरे पूरे गाँव को अपनी गिरफ्त में ले रहा था। अर्जुन ने कुछ युवकों को संगठित करने का प्रयास किया, पर जमींदार के भय के आगे उनकी एकता टिक सकी।

 

दृश्य

वह एक अमावस की अंधेरी रात थी। आकाश में चाँद था, तारे। चारों ओर एक भयानक सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल झींगुरों की आवाज़ और कुत्तों के कभी-कभार भौंकने की ध्वनि ही भंग कर रही थी। अर्जुन का परिवार गहरी नींद में था, दिन भर की चिंता और थकान के बाद।

तभी, लगभग आधी रात के समय, गाँव के बाहर से घोड़ों की टापों और कुछ दबी-दबी आवाज़ों का शोर सुनाई दिया। धीरेंद्र प्रताप सिंह के लगभग पंद्रह-बीस लठैत, मशालें और लाठियाँ लिए हुए, चुपके से अर्जुन के खेतों की ओर बढ़ रहे थे। उनका इरादा स्पष्ट थाअर्जुन और उसके परिवार को ऐसा सबक सिखाना जिसे वे कभी भूल सकें।

खेतों में पहुँचते ही लठैतों ने अर्जुन की मेहनत से उगाई गई, लगभग पक चुकी ज्वार और बाजरे की फसल को बेरहमी से रौंदना शुरू कर दिया। वे घोड़ों को फसल पर दौड़ा रहे थे, लाठियों से पौधों को तोड़ रहे थे, और अपनी क्रूर हँसी से रात के सन्नाटे को चीर रहे थे।

फसल तबाह करने के बाद वे दरिंदे अर्जुन के घर की ओर बढ़े। दरवाज़े पर ज़ोरदार लातें पड़ने लगीं। हरनाम सिंह और अर्जुन हड़बड़ाकर उठे। शारदा और माया भय से चीख पड़ीं।

खोल दरवाज़ा, हरनाम! आज तेरा सारा स्वाभिमान निकाल देंगे!” बाहर से एक लठैत की आवाज़ आई।

हरनाम सिंह ने अर्जुन को पीछे रहने का इशारा किया और स्वयं दरवाज़े की ओर बढ़े।कौन हो तुम लोग? रात के अँधेरे में चोरों की तरह क्यों आए हो?”

जैसे ही हरनाम सिंह ने दरवाज़ा खोला, कई लठैत एक साथ अंदर घुस आए। उन्होंने हरनाम सिंह को पकड़ लिया और उन पर लाठियों की वर्षा करने लगे।बड़ा स्वाभिमानी बनता है, बूढ़े! ले, अब भुगत अपनी ज़मीन बचाने का अंजाम!” एक लठैत गुर्राया।

हरनाम सिंह चीख उठे, पर उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपनी कमज़ोर शक्ति से ही सही, उन दरिंदों का सामना करने लगे। अर्जुन यह दृश्य देखकर अपने क्रोध पर काबू रख सका। वह एक शेर की तरह लठैतों पर टूट पड़ा। उसने पास रखी एक मोटी लकड़ी उठा ली और अंधाधुंध वार करने लगा। कुछ क्षणों के लिए लठैत भी उसकी फुर्ती और साहस देखकर पीछे हटे।

किन्तु वे संख्या में अधिक थे और शस्त्रों से लैस। दो लठैतों ने अर्जुन को पीछे से पकड़ लिया, जबकि अन्य हरनाम सिंह को पीटते रहे। शारदा और माया एक कोने में दुबकी रो रही थीं। तभी, दो लठैत उनकी ओर बढ़े, उनकी आँखों में वासना की चमक थी।आज जमींदार साहब ने कहा है कि इन औरतों का भी मान-मर्दन कर देना, ताकि भविष्य में कोई सिर उठाने की हिम्मत करे।

यह सुनकर अर्जुन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। उसने अपनी पूरी शक्ति लगाकर स्वयं को छुड़ाया और उन दो लठैतों पर झपटा जो उसकी माँ और बहन की ओर बढ़ रहे थे। एक भयानक संघर्ष हुआ। अर्जुन अकेला था, पर उसके भीतर अपने परिवार की रक्षा करने की अदम्य इच्छाशक्ति थी। उसने एक लठैत के सिर पर ज़ोरदार प्रहार किया, जिससे वह चीखता हुआ गिर पड़ा। दूसरे से गुत्थमगुत्था होते हुए अर्जुन को भी कई चोटें आईंउसके माथे से रक्त बहने लगा, कंधे पर लाठी का गहरा घाव लगा। किन्तु उसने उन दरिंदों को अपनी माँ और बहन तक नहीं पहुँचने दिया।

इसी बीच, हरनाम सिंह बुरी तरह घायल होकर ज़मीन पर गिर चुके थे। उनके मुँह से खून निकल रहा था और वे लगभग अचेत थे। लठैतों ने जब देखा कि हरनाम सिंह अधमरे हो चुके हैं और अर्जुन भी घायल है, तथा गाँव में शोर सुनकर कुछ लोग जागने लगे हैं, तो वे वहाँ से भाग निकले, जाते-जाते धमकी देते हुए, “यह तो केवल शुरुआत है! यदि तीन दिन में ज़मीन खाली नहीं की, तो पूरे परिवार को जान से मार देंगे!”

उनके जाने के बाद घर में केवल सिसकियाँ और कराहें शेष थीं। अर्जुन अपनी चोटों की परवाह करते हुए अपने पिता के पास पहुँचा। हरनाम सिंह की हालत अत्यंत गंभीर थी।

दृश्य

भोर होने से पहले ही अर्जुन ने गाँव के दो-एक भरोसेमंद लोगों की सहायता से एक पुरानी काष्ठ शकट (बैलगाड़ी) का प्रबंध किया। उसने और शारदा ने मिलकर जैसे-तैसे घायल और लगभग अचेत हरनाम सिंह को गाड़ी में लिटाया। माया रोती हुई उनके पीछे-पीछे चल रही थी। उनका लक्ष्य था निकटतम आरक्षी चौकी, जो वहाँ से लगभग चार कोस दूर थी। अर्जुन को अब भी कानून पर एक क्षीण सी आशा थी कि शायद उसके पिता पर हुए इस जानलेवा हमले के बाद आरक्षक कुछ कार्रवाई करेंगे।

कच्चे, ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर काष्ठ शकट धीरे-धीरे हिचकोले खाती हुई आगे बढ़ रही थी। प्रत्येक हिचकोले के साथ हरनाम सिंह के मुँह से एक दर्दनाक कराह निकल जाती थी। अर्जुन का हृदय पीड़ा और क्रोध से फटा जा रहा था।

घंटों के सफर के बाद वे आरक्षी चौकी पहुँचे। चौकी एक पुराने, टूटे-फूटे भवन में स्थित थी। बाहर कुछ आरक्षक ऊँघ रहे थे, तो एक मोटा-सा मुंशी अंदर मेज पर पैर फैलाए बीड़ी पी रहा था।

अर्जुन ने कांपती आवाज़ में मुंशी को पूरी घटना बताईधीरेंद्र प्रताप सिंह की धमकी, खेतों की तबाही, और उसके पिता पर हुआ जानलेवा हमला। उसने अपने पिता की गंभीर हालत भी दिखाई।

मुंशी ने अत्यंत उपेक्षापूर्ण ढंग से उनकी ओर देखा, फिर बीड़ी का एक लंबा कश खींचा।हूँ, तो धीरेंद्र प्रताप सिंह पर आरोप लगा रहे हो? जानते हो वह कितने बड़े आदमी हैं? और तुम्हारे पास क्या प्रमाण है कि यह सब उन्होंने ही करवाया है?”

प्रमाण?” अर्जुन चीखा। मेरे घायल पिता प्रमाण हैं! हमारी बर्बाद फसल प्रमाण है! पूरा गाँव जानता है कि धीरेंद्र प्रताप हमारी ज़मीन हड़पना चाहता है!”

चिल्लाओ मत, छोकरे!” मुंशी ने उसे धमकाया।गाँव वालों की गवाही का कोई मूल्य नहीं, वे तो कुछ भी कह देंगे। और यह भी तो हो सकता है कि यह झगड़ा तुमने ही शुरू किया हो। ज़मीन का पुराना विवाद है, कुछ कहा नहीं जा सकता।

एक आरक्षक, जो शायद धीरेंद्र प्रताप का खास आदमी था, आगे बढ़ा।हाँ, मुंशी जी। मुझे तो लगता है यह लड़का ही फसाद की जड़ है। शहर से पढ़-लिखकर आया है, ज़्यादा हवा में उड़ता है। इसी ने जमींदार साहब को उकसाया होगा।

अर्जुन स्तब्ध रह गया। न्याय की अंतिम आशा भी जैसे दम तोड़ रही थी। वे लोग, जिनका कर्तव्य पीड़ितों की रक्षा करना था, वे ही अत्याचारियों का साथ दे रहे थे।

आप हमारा अभियोग पत्र लिखेंगे या नहीं?” अर्जुन ने अपनी अंतिम शक्ति बटोरकर पूछा।

मुंशी ने उपहासपूर्ण ढंग से हँसते हुए कहा, “अभियोग पत्र? किसके विरुद्ध? धीरेंद्र प्रताप सिंह के विरुद्ध? जाओ, जाओ, पहले अपने बाप का उपचार कराओ। और हाँ, शहर में किसी अच्छे वैद्य को दिखाना, सरकारी अस्पताल में तो आजकल दवाएँ भी नहीं मिलतीं।उसने स्पष्ट रूप से उनकी सहायता करने से इनकार कर दिया।

अर्जुन का मन घृणा और विवशता से भर गया। जिस व्यवस्था पर उसे विश्वास था, वह पूरी तरह सड़ चुकी थी। उसके पिता मरणासन्न थे, उसकी माँ और बहन भयभीत थीं, और कानून के रक्षक ही अपराधियों के साथ खड़े थे। उसके भीतर एक भयानक तूफान उठ रहा था। रामपुर लौटते हुए काष्ठ शकट में पड़े अपने कराहते पिता को देखते हुए अर्जुन की आँखों से आशा के अंतिम आँसू भी सूख चुके थे, और उनकी जगह ले ली थी एक ठंडी, कठोर संकल्प की अग्नि ने। यह अन्याय की पराकाष्ठा थी, और अब वह जानता था कि इस पराकाष्ठा का उत्तर उसे स्वयं ही देना होगा।





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